#58 पलायन
hind poem on palayan in india

#58 पलायन

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पलायन

आशियाना संभालनें,
आशियाना छोंड कर निकले,
फैली महामारी ऐसी कि,
आशियाने की ओर निकले ।
जिस विज्ञान का गुरूथ था,
मेहनत का शुरूर था,
व्यवस्था हो गई ऐसी,
कि सब नंगे पैर निकले ।
दो वक्त की रोटी व्यवस्थित,
थे व्यवस्थित दिन कार्य,
पर हालात ऐसे बन गए,
कि अब भूखे पेट निकले ।
बस राह में सब चल दिए,
तज मौत का हर खौफ अब,
महामारी न छुए सायद,
प्राण भूखे पेट निकले ।

गांव बडी दूर नंगे पांव है जाना,
फैली महामारी तबाह सब कर रही,
जिये या मरें कोई गम नहीं न सोंचा कभी,
मन में बस इक सोंच अपनों के पास है जाना ।
भूखे पेट हैं तो क्या तो क्या नहीं वाहन,
प्रतिज्ञा की है दृढ राहों में लाख मिले पाहन,
आशियाना संवारने तज आशियाना निकले थे,
इस विपत भरी घरी में कुटुम्ब को है जाना ।

 


–>सम्पूर्ण कविता सूची<–


Hindi Poem on Palayan During Corona pendamic.

Read A hindi poem on corona palayan

Explanation-

This Hindi poem is expressing the thoughts about the palayan during the corona pandemic in 2020, as the picture or vision shows that all the workers away from their home want to return to their home. The logic is behind is that Villege may be unemployed but not hungery.

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jk namdeo

मैं समझ से परे। एकान्त वासी, अनुरागी, ऐकाकी जीवन, जिज्ञासी, मैं समझ से परे। दूजों संग संकोची, पर विश्वासी, कटु वचन संग, मृदुभाषी, मैं समझ से परे। भोगी विलासी, इक सन्यासी, परहित की रखता, इक मंसा सी मैं समझ से परे।