#18-गौरैया The sparrow

सुन गौरैया वर्षों पहले मेरा आंगन महकाती थी,

मेरा बचपन फुदक तेरे संग, उछल कूद सिखाती थी,
डालूं दाना आंगन में जितने, तू आ के चुंग जाती थी,
मेरे आंगन का पेड सुनहरा, रहता तेरा सुन्दर बसेरा,
सांझ ढले तू भी सो जाती, चहके मन मोहे जब होए सबेरा।

ऐ गौरैया कहाँ गई तू, लौट के आ जा जहाँ गई तू,
बिन तेरे अब आंगन सूना, दुनिया तुझको धता बताती,
मेरा आंगन चहक महक से, तू हर पल बरसाती थी,
सुन गौरैया वर्षों पहले मेरा आंगन महकाती थी।

Published by

Jitendra Kumar Namdeo

मैं समझ से परे। एकान्त वासी, अनुरागी, ऐकाकी जीवन, जिज्ञासी, मैं समझ से परे। दूजों संग संकोची, पर विश्वासी, कटु वचन संग, मृदुभाषी, मैं समझ से परे। भोगी विलासी, इक सन्यासी, परहित की रखता, इक मंसा सी मैं समझ से परे।

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