#10-शरद बखानी

(Sharad Bakhani)

पानी सरपत से सरकत जाए रे।
ठंडी हवा का झोंका रोंवा कंपकंपाए रे,
पानी सरपत से सरकत जाए रे।

दूर तलक देखो कोई आश नहींं है,
सूखा सा पडा है कोई घास नहीं है,
मन से मैं बोलूं तो विश्वास नहीं है,
शरद की ये वारिस से मन थिरकत जाए रे,
पानी सरपत से सरकत जाए रे।

हर तरफ देखो अब दिखेगी हरियाली,
शरद की वारिस से दौडेगी खुशहाली,
देश में फिर सब आशंक मुक्त होंगे,पर
देश का बच्चा बच्चा शनकत जाए रे,
पानी सरपत से सरकत जाए रे।

Author: Jitendra Kumar Namdeo

मैं समझ से परे। एकान्त वासी, अनुरागी, ऐकाकी जीवन, जिज्ञासी, मैं समझ से परे। दूजों संग संकोची, पर विश्वासी, कटु वचन संग, मृदुभाषी, मैं समझ से परे। भोगी विलासी, इक सन्यासी, परहित की रखता, इक मंसा सी मैं समझ से परे।

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