#28-Restless Travelling बेचैन भ्रमण

Category : hindi poems

अपनें मन की बातों को न समझ पाया अब तक,
न कर पाया न्याय अपनें विचारों के साथ,
मन का वो समन्दर हिलोरे मार रहा है यूँ,
कि लगे जैसे मैं आज दुनिया को खटक रहा हूँ,
मैं बेचैन हो यूँ भटक रहा हूँ।

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Jitendra Kumar Namdeo

मैं समझ से परे। एकान्त वासी, अनुरागी, ऐकाकी जीवन, जिज्ञासी, मैं समझ से परे। दूजों संग संकोची, पर विश्वासी, कटु वचन संग, मृदुभाषी, मैं समझ से परे। भोगी विलासी, इक सन्यासी, परहित की रखता, इक मंसा सी मैं समझ से परे।

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