#15-हमारी आश

राह से गुजरते हर राहगीर से हमनें आश लगाई है।

जमाने के शिले नें हमें यूँ हि भटकता छोड दिया,
दो वक्त की रोटी को यूँ हि तरसता छोड दिया,
कभी खाए कभी न खाए भूखे पेट यूँ हि,
पर रोज हमनें भूखों की महफिलें लगाई है,
राह से गुजरते हर राहगीर से हमनें आश लगाई है।

जमाना हमें देख कर यूँ हि विचकता दिखता है,
पास जब हम जाते हैं तो वो थिरकता दिखता है,
हाँथ में देख कर कटोरा यूँ धुत्कारता है हमे,
जैसे उसकी हमसे जन्मों जन्मों की लडाई है,
राह से गुजरते हर राहगीर से हमनें आश लगाई है।

आश पर विश्वास की जो जंग सी चलती रहती,
पेट की वो भूख मिटाने को जंग जो चलती रहती,
दिखते देते हर पल यूँ हि हमको सलाह इस दुनिया में,
पर वास्तव में यह हमारे इम्तिहान की अंगडाई है,
राह से गुजरते हर राहगीर से हमनें आश लगाई है।

Author: Jitendra Kumar Namdeo

मैं समझ से परे। एकान्त वासी, अनुरागी, ऐकाकी जीवन, जिज्ञासी, मैं समझ से परे। दूजों संग संकोची, पर विश्वासी, कटु वचन संग, मृदुभाषी, मैं समझ से परे। भोगी विलासी, इक सन्यासी, परहित की रखता, इक मंसा सी मैं समझ से परे।

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