मंजिल क्या है

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मंजिल क्या है

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ऐ पवन ! ठहर जरा,
तू हि बता तेरी मंजिल क्या है?
तू कभी सोंचता है, तेरे भाग्य में लिखा क्या है?
ऐ सूरज! तू ठहर जरा,
क्यों तू बार-बार यहां से गुजरता है
तेरी मंजिल कहां छुपी है क्या तुझे पता है
क्यों तू जग रोशन करता है
तू ही बता तेरी मंजिल क्या है
ऐ भौंरे रुक जा तू यहीं पर
क्यों हर पुष्प से आलिंगन करता है
क्या तूनें अपनी मंजिल नहीं चुनी है
सब कहते हैं सबकी मंजिल है,
ऐ भौंरे तू बता, तेरी मंजिल क्या है


About Author

Jitendra Kumar Namdeo

मैं समझ से परे। एकान्त वासी, अनुरागी, ऐकाकी जीवन, जिज्ञासी, मैं समझ से परे। दूजों संग संकोची, पर विश्वासी, कटु वचन संग, मृदुभाषी, मैं समझ से परे। भोगी विलासी, इक सन्यासी, परहित की रखता, इक मंसा सी मैं समझ से परे।

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