#21-दृढ बनो

निकला था अलि भ्रमर में अंजानें मंजिल की खोज,
दिल में आश लगाए भटके, मन में मंजिल पानें की सोंच,
राह भटकते रात हुई वह वह लौट पडे निज गृह को तेज,
स्वप्न में मंजिल को ढूंढे, निकल पडे निज गृह को छोड,
निकला था अनि भ्रमर में, अंजाने मंजिल की खोज।

आश न छोडे चाह न छोडे निकले दिन प्रति दिन वह,
बिना राह के मंजिल ढूंढे, पूंछे मंजिल पुष्पों से वह,
राह के हर पुष्प से करे मंजिल की कडी जांच,
लेकिन तोडे न दिल की आश, दृढ प्रतिज्ञ की जरूरत आझ,

शुरू करो जिस को, अन्त करो पाओ परिणाम,
सभी मुश्किलों से लडो निकल जाए चाहे तुम्हरे प्राण।

Author: Jitendra Kumar Namdeo

मैं समझ से परे। एकान्त वासी, अनुरागी, ऐकाकी जीवन, जिज्ञासी, मैं समझ से परे। दूजों संग संकोची, पर विश्वासी, कटु वचन संग, मृदुभाषी, मैं समझ से परे। भोगी विलासी, इक सन्यासी, परहित की रखता, इक मंसा सी मैं समझ से परे।

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